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Shashi Bala With Her Team Feeding Poor People In North-east Delhi – मजहबी खाई पाटकर भूखों का पेट भर रहीं महिलाएं, उतर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा और कोरोना की मार नहीं तोड़ पाई हौसला – GoIndiaNews

अभिषेक पाण्डेय, अमर उजाला, नई दिल्ली

Updated Tue, 29 Sep 2020 06:09 AM IST

शशि बाला की टीम गरीबों के लिए बना रही खाना
– फोटो : amar ujala

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उतर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा और कोरोना की मार भी इन महिलाओं के हौसले को नहीं तोड़ पाई। बाबू नगर, शिव विहार, मुस्तफाबाद सहित अन्य इलाकों में इन महिलाओं ने खुद के बल पर बेघरों दो वक्त का खाना मुहैया कराया। हम बात कर रहे हैं महालक्ष्मी एनक्लेव की रहने वाली शशि बाला की, जिनके जज्बे ने समाज को एक नई सीख दी है। 

शशि ने हिंसा नियंत्रित होने के बाद 20 महिलाओं की एक टोली बनाई, जिनकी मदद से सैकड़ों लोगों का खाना बनाने का कार्य शुरू किया। महिलाओं की यह टोली आर्थिक रूप से मजबूत लोगों से अनाज लेकर उसका भोजन तैयार करती, जिसके बाद उसे बेसहारों के बीच बांटा जाता। शशि ने दोनों समुदायों के बीच बगैर किसी भेदभाव के मदद कर आपसी सौहार्द कायम करने का भी प्रयास किया। 

उनकी टीम में कई मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं, जो अपने-अपने इलाके में खाने का पैकेट बांटने का काम करती रही। शशि बताती हैं कि उनका इलाका पहले काफी शांति प्रिय हुआ करता था, लेकिन कुछ शरारतीतत्वों की वजह से पूरा माहौल बदल गया। इसके बाद कोरोना की वजह से लॉकडाउन ने भी लोगों के बीच दूरियां काफी कायम कर दी। यह सब देखकर शशि ने ठान लिया कि महिलाओं की एक टीम बनाकर भूखे-प्यासे लोगों की मदद करेंगी। अपने इस कार्य के लिए शशि ने आर्थिक रूप से मजबूत लोगों के घरों से चंदा के रूप में अनाज एकत्र करना शुरू किया। 

कोरोना संकट के बीच उनकी टीम ने सामाजिक दूरी का पालन करते हुए भी लगातार खाना बनाने और बांटने का काम किया। महिलाओं की टोली ने कुछ ऐसे लोगों की भी मदद की, जिनके पास लॉकडाउन में कोई कामकाज नहीं था। महिलाओं ने उन्हें रहने के लिए अपना घर बगैर किसी किराये के मुहैया करवाया। साथ ही जिनके पास अपने घरों तक जाने के लिए रुपये नहीं थे, उन्हें रुपये देकर घरों के लिए भेजा। शशि बताती हैं कि वह आगे भी अपने इस काम को जारी रखेंगी।  

जींस की कारखाने में बन रहे मास्क

मुस्तफाबाद और करवाल नगर जींस के छोटे-छोटे कारखाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन लॉकडाउन में मजदूर व बाजार न होने से काम पूरी तरह से ठप हो गया। कारखाना मालिक शिशपाल बताते हैं कि जींस बनाने का काम ठप हो जाने पर उन्होंने मास्क बनाने का काम शुरू कर दिया। हिंसा के बाद से ही इलाके में ज्यादातर कारखानों का यही हाल है।

जैकेट का बाजार पड़ा ठंडा

जिस जाफराबाद से से हिंसा की चिंगारी उठी थी वहां जैकेट का सबसे बड़ा थोक बाजार है। जैकेट बनाने वाले कारोबारी मोहम्मद असलम बताते हैं कि पहले सितंबर के अंत तक बड़ी संख्या में बिक्री हो जाती थी, लेकिन अब बाजार पूरी तरह से ठंडा पड़ा है। ऐसा ही हाल रहा था तो उनका व्यापार पूरी तरह से ठप हो जाएगा। जैकेट कारोबारियों को उम्मीद है कर कही अक्टबूर तक उनके कारोबार में कुछ सुधार में हो।

उतर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा और कोरोना की मार भी इन महिलाओं के हौसले को नहीं तोड़ पाई। बाबू नगर, शिव विहार, मुस्तफाबाद सहित अन्य इलाकों में इन महिलाओं ने खुद के बल पर बेघरों दो वक्त का खाना मुहैया कराया। हम बात कर रहे हैं महालक्ष्मी एनक्लेव की रहने वाली शशि बाला की, जिनके जज्बे ने समाज को एक नई सीख दी है। 

शशि ने हिंसा नियंत्रित होने के बाद 20 महिलाओं की एक टोली बनाई, जिनकी मदद से सैकड़ों लोगों का खाना बनाने का कार्य शुरू किया। महिलाओं की यह टोली आर्थिक रूप से मजबूत लोगों से अनाज लेकर उसका भोजन तैयार करती, जिसके बाद उसे बेसहारों के बीच बांटा जाता। शशि ने दोनों समुदायों के बीच बगैर किसी भेदभाव के मदद कर आपसी सौहार्द कायम करने का भी प्रयास किया। 

उनकी टीम में कई मुस्लिम महिलाएं भी शामिल हैं, जो अपने-अपने इलाके में खाने का पैकेट बांटने का काम करती रही। शशि बताती हैं कि उनका इलाका पहले काफी शांति प्रिय हुआ करता था, लेकिन कुछ शरारतीतत्वों की वजह से पूरा माहौल बदल गया। इसके बाद कोरोना की वजह से लॉकडाउन ने भी लोगों के बीच दूरियां काफी कायम कर दी। यह सब देखकर शशि ने ठान लिया कि महिलाओं की एक टीम बनाकर भूखे-प्यासे लोगों की मदद करेंगी। अपने इस कार्य के लिए शशि ने आर्थिक रूप से मजबूत लोगों के घरों से चंदा के रूप में अनाज एकत्र करना शुरू किया। 

कोरोना संकट के बीच उनकी टीम ने सामाजिक दूरी का पालन करते हुए भी लगातार खाना बनाने और बांटने का काम किया। महिलाओं की टोली ने कुछ ऐसे लोगों की भी मदद की, जिनके पास लॉकडाउन में कोई कामकाज नहीं था। महिलाओं ने उन्हें रहने के लिए अपना घर बगैर किसी किराये के मुहैया करवाया। साथ ही जिनके पास अपने घरों तक जाने के लिए रुपये नहीं थे, उन्हें रुपये देकर घरों के लिए भेजा। शशि बताती हैं कि वह आगे भी अपने इस काम को जारी रखेंगी।  

जींस की कारखाने में बन रहे मास्क

मुस्तफाबाद और करवाल नगर जींस के छोटे-छोटे कारखाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन लॉकडाउन में मजदूर व बाजार न होने से काम पूरी तरह से ठप हो गया। कारखाना मालिक शिशपाल बताते हैं कि जींस बनाने का काम ठप हो जाने पर उन्होंने मास्क बनाने का काम शुरू कर दिया। हिंसा के बाद से ही इलाके में ज्यादातर कारखानों का यही हाल है।

जैकेट का बाजार पड़ा ठंडा

जिस जाफराबाद से से हिंसा की चिंगारी उठी थी वहां जैकेट का सबसे बड़ा थोक बाजार है। जैकेट बनाने वाले कारोबारी मोहम्मद असलम बताते हैं कि पहले सितंबर के अंत तक बड़ी संख्या में बिक्री हो जाती थी, लेकिन अब बाजार पूरी तरह से ठंडा पड़ा है। ऐसा ही हाल रहा था तो उनका व्यापार पूरी तरह से ठप हो जाएगा। जैकेट कारोबारियों को उम्मीद है कर कही अक्टबूर तक उनके कारोबार में कुछ सुधार में हो।

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