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मतदाताओं को लुभाने के लिए NDA ने किया डर का इस्तेमाल, क्या यह चुनावी लाभ में बदल पाएगा? – GoIndiaNews

सत्ताधारियों का राजद के प्रति मतदाताओं में नकारात्मक छवि कायम करने का यह एक अहम प्रयास है.

सत्ताधारियों का राजद के प्रति मतदाताओं में नकारात्मक छवि कायम करने का यह एक अहम प्रयास है.

Bihar Assembly Elections 2020: एनडीए का मानना है, 1990 और फरवरी 2005 के बीच लालू शासन के 15 साल का जंगल राज जनता की आंखों से आज भी ओझल नहीं हुआ है और यह मुद्दा नीतीश से नाराज मतदाताओं को भी उनकी ओर खींचने का काम कर सकता है.


  • News18Hindi

  • Last Updated:
    October 26, 2020, 11:42 AM IST

पटना. बिहार (Bihar) में बुधवार (28 अक्टूबर) विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2020) पहले चरण का मतदान होने वाला है. सूबे में पक्ष और विपक्ष मतदाताओं (Voters) को लुभाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही हैं. इधर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) की जेडीयू (JDU) और उसके घटक दल बीजेपी (BJP) ने विकास के मुद्दे से हटकर राज्य के पूर्व मूख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की राजद (RJD) सरकार के 15 साल के शासन में ‘जंगल राज’ और व्यापक ‘माओवादी हिंसा’ की लोगों को याद दिला उनके डर का ताजा करने का काम किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लालू-राबड़ी के शासन को लोगों के लिए अहितकारी बताया है. सत्ताधारियों का राजद के प्रति मतदाताओं में नकारात्मक छवि कायम करने का यह एक अहम प्रयास है.

बिहार की जनता के जख्मों को हरा कर रहे सत्ताधारी
बता दें कि मध्य और दक्षिण बिहार में माओवादी हिंसा का पुराना इतिहास रहा है, और यहां 28 अक्टूबर को 16 जिलों में फैले 71 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव होने हैं. वहीं जेडीयू-बीजेपी मिलकर लालू के खिलाफ लोगों में माओवादी हिंसा के जख्मों को हरा करने की कोशिश में जुटी हुई है. लेकिन क्या चुनाव में लोगों में लालू के जंगल राज और माओवादी हिंसा के डर को जीवित करने का यह प्रयास वास्तव में सत्ताधारियों के लिए चमत्कारी साबित होगा?

लालू के जंगल राज का राग अलाप रहा राजग जहां तक एनडीए का मानना है, 1990 और फरवरी 2005 के बीच लालू शासन के 15 साल का जंगल राज जनता की आंखों से आज भी ओझल नहीं हुआ है और यह मुद्दा नीतीश से नाराज मतदाताओं को भी उनकी ओर खींचने का काम कर सकता है. वहीं, विपक्ष जनता में जेडीयू-भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ नकारात्मक छवि बनाने में खुद को साबित नहीं कर पा रही है. ऐसे में जंगल राज और नक्सल राज जैसे मुद्दों को हथियार बनाकर लोगों में डर बैठाकर कुमार और पीएम मोदी ने मतदाताओं को रिझाने का काम किया है.

तेजस्वी ने विकास के मुद्दे से हटने पर सत्ताधारियों को घेरा
वहीं, चुनावी रैलियों में राजद और वामपंथी दलों के समर्थकों का उन्मादी मिजाज ही राजद और उसके सहयोगियों के खिलाफ लोगों में एक सामान्य अविश्वास का काम कर रहा है. लेकिन, राजद के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी प्रसाद यादव ने हालांकि इस तरह के आरोपों को खारिज किया है और पीएम मोदी पर बिहार के मुद्दों का चयन करने और बेरोजगारी और अन्य प्रमुख मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने पर उनपर जमकर बरसे हैं.

इसे भी पढ़ेंः- बिहार के वोटर्स से उद्धव ठाकरे की अपील, बोले- 2014 में हमारे साथ थे नीतीश, सोच समझकर वोट करें

शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाई
बता दें कि यह भी सच है कि कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने राज्य में इस मिथक को ध्वस्त कर दिया कि बिहार में अपराध पर लगाम नहीं लगाई जा सकती. उन्होंने शासन में शून्य-सहिष्णुता की नीति अपनाई और सांप्रदायिक तनाव और जाति संघर्ष के कारण किसी भी अपराध के लिए जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षकों को सीधे जवाबदेह बनाने की कोशिश की है.

नीतीश ने निकाला माओवाद से निपटने का हल
माओवादी अतिवाद से जुड़ी हिंसा से निपटने के लिए कुमार ने बिहार में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित 11 जिलों में आवश्यक बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए केंद्र की एकीकृत कार्य योजना को भी लागू किया. साथ ही नीतीश सरकार ने माओवादी ग्रस्त क्षेत्रों में विकास योजनाओं के साथ ‘सरकार आपके द्वार’ जैसे कार्यक्रमों की नींव रखी. बता दें कि सोन नदी के दोनों किनारों पर मध्य और दक्षिण बिहार में पड़ने वाले क्षेत्र माओवादियों और भूस्वामियों के बीच चार दशकों से खूनी संघर्ष के बड़े उदाहरण रहे हैं. बिहार के मुद्दों में से एक सोन नदी, जो बिहार के मगध और रोहतास क्षेत्रों को विभाजित करती है, एक बार फिर राज्य के चुनावों के पहले चरण में एनडीए और महागठबंधन के बीच एक राजनीतिक अखाड़ा बनकर सामने आई है. क्योंकि यहां राज्य के 35 मुख्य निवार्चन क्षेत्र हैं. जिसमें राजधानी पटना के साथ गया, नवादा औरंगाबाद और नालंदा जैसे बड़े जिले शामिल हैं.

2005 से बदला राज्य की राजनीति का स्वरूप
अंत में कुमार के नेतृत्व में उच्च जातियों, ईबीसी, महादलितों और मध्य बिहार के शक्तिशाली कुर्मियों को शामिल करते हुए एक नए सामाजिक संयोजन का रास्ता बनाने के लिए 2005 के बाद से ही नीतीश सरकार के शुरुआती दौर में आपराधिक-रानजीतिक व्यूहचक्र में कमी आने लगी थी. नीतीश की इस सोच ने राज्य के राजनीतिक स्वरूप को बदलकर रख दिया था. लालू-राबड़ी के जंगल राज और माओवादी हिंसा का डर पैदा करने की नीतीश और एनडीए की इस रणनीति में यह देखना बाकी है कि क्या यह रणनीति उनके लिए लाभ का काम करेगी, यदि बिहार की जनता लालू शासन के इस दंश को नहीं भूली तो शायद राजद की राजनीतिक कड़ियां और कमजोर होती चली जाएंगी.

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