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प्याज़ की महंगाई को हल्के में लेना ठीक नहीं | – News in Hindi – GoIndiaNews

पिछले हफ़्ते प्याज़ की महंगाई (Onion Prices) ने सनसनी फैला दी. भले ही प्याज़ के दाम बढ़ने से महंगाई के एकमुश्त आंकड़े पर ज्यादा असर न पड़ता हो, लेकिन गौरतलब है कि प्याज़ भारतीय रसोई की बहुत जरूरी चीज़ है. इसीलिए नया कानून (New Farm Laws) आने के पहले तक इसे आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में रखा जाता था. और पिछले महीने ही कानून बदलकर छूट दी गई थी कि कोई भी कितना भी प्याज़ जमा कर सकता है.

अब जब पता चला कि प्याज के दाम आसमान छूने लगे हैं तो फिर से सरकारी शिकंजा कसना पड़ा कि खुदरा व्यापारी दो टन से ज्यादा और थोक व्यापारी 25 टन से ज्यादा प्याज़ अपने कब्जे में नहीं रख सकते. ये तो खैर व्यापार और राजकाज की बातें हैं और हमेशा से चली आ रही हैं लेकिन गौर करने के बात यह है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए सरकारी उपायों का प्रचार प्रसार इस बार ही सबसे ज्यादा किया गया था. और अगर महंगाई की शुरुआत ही प्याज़ जैसे जरूरी खाद्य पदार्थ से हुई हो प्याज़ की महंगाई को ज़रा गहराई से समझ लेना चाहिए. महंगाई का रोग बढ़ते देर नहीं लगती.

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साल में तीन बार उपजने वाला प्याज़

प्याज उन अनोखी सब्ज़ियों में है जो अपने देश में खरीफ और रबी दोनों फसलों में उगता है. खरीफ में तो दो बार उगाया जाता है. यानी प्याज़ की फसल साल में तीन बार आती है. इसीलिए तीन महीने से लेकर पांच महीने में तैयार होने वाले प्याज़ की आवक लंबे समय तक ठहरी नहीं रहती. इतना ही नहीं, प्याज़ देश के कई भागों में उगता है. किसी एक जगह कभी मौसम की मार पड़ भी जाए तो दूसरी जगह से भरपाई की गुंजाइश बनी रहती है. यानी यह बेकार की बात है कि पूरे देश में प्याज़ के हाहाकार मचने के पीछे सिर्फ मौसम के सिर ठीकरा फोड़ा जाए.

हम हद से ज्यादा प्याज़ उगाने वाले देश
याद दिलाने का यह सबसे अच्छा मौका है कि अपना देश दुनिया में सबसे ज्यादा प्याज़ उगाने वाले पहले दो देशों में शामिल है. चीन के बाद हमारा ही नंबर है. औसतन अपनी कुल सालाना जरूरत का डेढ़ गुना प्याज़ भारत में पैदा होता है. यानी किसी भी साल प्याज़ का उत्पादन 25 फीसद तो क्या, 33 फीसद भी कम हो तब भी प्याज की कमी पड़नी नहीं चाहिए. और अगर पड़ जाती है तो मार्केटिंग, व्यापार, महंगाई काबू में रखने वाली नीतियों या जमाखोरी के अलावा और क्या कारण हो सकते हैं? पिछले हफ़्ते अगर सरकार को एक निश्चित सीमा से ज्यादा प्याज़ रखने पर फिर से पाबंदी का ऐलान करना पड़ा हो तो यही समझा जाएगा कि सरकार ने जमाखोरी की बात को कबूला है.भंडारण में झोल
सरकारी संस्था नाफेड ने इसी हफ़्ते देश में प्याज़ भंडारण की स्थिति बताई है. इस साल एक लाख टन प्याज का भंडारण किया गया था. गौरतलब है कि भंडारण इसी मकसद से किया जाता है कि अगर बाजार में कमी के कारण कोई चीज़ महंगी हो रही हो तो सरकारी गोदामों से उसे बाजार तक भेज दिया जाए. लेकिन हैरत जताई जानी चाहिए कि पिछले दिनों जब प्याज के दामों से हाहाकार मचा तब तक नाफेड के गोदामों में कुल भंडारण का सिर्फ 25 फीसद प्याज़ ही बचा था. यानी 75 फीसद प्याज पहले ही खत्म हो चुका था. हालांकि यह पूरा का पूरा ही बाजार नहीं पहुंचा बल्कि सिर्फ 43 हजार टन ही पहुंचा और बाकी भंडारण में ही बर्बाद हो गया.

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नाफेड ने नि:संकोच बताया कि एक चौथाई प्याज़ खराब हो गया. अगर प्याज़ की कमी को लेकर हाहाकार मचा हो तो इतनी भारी मात्रा में भंडारित प्याज़ की बर्बादी पर गंभीर सोच विचार का यह सही मौका है. अलबत्ता यह सिर्फ प्याज़ के मामले में ही नहीं है. बल्कि ढेरों कृषि उत्पादों के साथ यही समस्या है. यह समस्या कुछ साल से बढ़त पर है.

खेत से रसोई तक सफर
इन्हीं दिनों देश के मुख्यधारा मीडिया में एक रिपोर्ट यह भी दिखी कि किसान तो प्याज़ एक रुपए प्रति किलो बेचने को मजबूर हुआ था और अब उपभोक्ता 80 रुपए किलो खरीदने को मजबूर है. इस सनसनीखेज विसंगति पर ज्यादा सिर खपाने की जरूरत होनी नहीं चाहिए. क्योंकि फसल आने के समय अक्सर ही खबरें दी जाती हैं कि बंपर पैदावार हुई है. और किसान के पास से माल निकल जाने के बाद उत्पादन कम होने की खबरें बढ़ जाती हैं.

इस साल भी जब कुछ इलाकों में बारिश से प्याज की फसल खराब हुई तो यह साफ-साफ हिसाब नहीं लगाया गया कि उत्पादन पर कितना फर्क पड़ेगा? इस साल प्याज के उत्पादन के विश्वसनीय आंकड़े आज दिन तक उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में बाजार में किसी चीज़ की कमी की अफवाहों को फैलाए जाने को कौन रोक सकता है.

महामारी बाद की स्थितियों पर नज़र जरूरी
तीन महीने पहले की ही बात है. अपराधशास्त्रीय नज़रिए से आगाह किया गया था कि महामारी या युद्ध की स्थितियों में जमाखोरी और कालाबाजारी के अपराध बढ़ जाते हैं. सुझाव दिए गए थे कि आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए ज्यादा ही चौकस रहना होगा. प्याज़ ने विशेषज्ञों के उस अंदेशे को सही साबित किया है.

संतोष की एक बात, समस्या स्थायी नहीं है
किसी भी कृषि उत्पाद की महंगाई कभी भी ज्यादा दिन नहीं ठहरती. प्याज की महंगाई की उम्र तो और भी कम होती है क्योंकि अपने देश में इसकी तीन फसलें आती हैं. जैसे ही किसान नया प्याज उगाएगा चारों तरफ बंपर उत्पादन की खबरें फिर बढ़ जाएंगी. हमेशा से ही होता आया है कि जब तक किसान अपनी पूरी उपज बेच नहीं लेता तब तक उसके दाम बढ़ने का सवाल ही खड़ा नहीं होने दिया जाता.

बहरहाल, प्याज़ के दाम के नए संकट ने एकबार फिर सोचने को मजबूर किया है कि जमाखोरों पर शिकंजा कैसे कसा जाए. प्याज़ जैसी जरूरी चीजों के सरकारी भंडारण की व्यवस्था को कैसे ठीक किया जाए. खासतौर पर इसकी बर्बादी रोकने के लिए रखरखाव को पुख्ता किया जाए. प्याज़ के आयात निर्यात का प्रबंधन तीसरा बड़ा नुक्ता है. और ये सिर्फ प्याज़ तक ही सीमित न रहे, बल्कि अब हर कृषि उत्पाद पर नज़र रखने की जरूरत दिख रही है.

ब्लॉगर के बारे में

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल ‘जनसत्ता’ के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो ‘कालचक्र’ मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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