Thursday, January 28, 2021
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भारत और चीन के बीच दोस्ती का पुल बना था ये ‘चीनी महात्मा’ – GoIndiaNews

भारत और चीन के बीच तनाव (India-China Tension) के बारे में कई थ्योरीज़ के साथ ही, आप जान चुके हैं कि कौन से चीनी व्यक्तित्व भारत के नज़रिये से दुश्मन या खलनायक रहे हैं. लेकिन, इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो एक चीनी नाम ऐसा भी मिलता है, जो चीन और भारत के बीच दोस्ती (Ind–China Peace), शांति और अहिंसा का पुल बना था; जिसने दो देशों के बीच एक साझा संस्कृति की मशाल जलाई थी; जिसने भारत को अपना दूसरा घर बनाया था; और जिसने दोनों देशों में प्यार और सम्मान हासिल किया था.

चीन के हुनान प्रांत में 1898 को जन्मे टैन युन-शैन का नाम शायद कम ही लोगों ने सुना होगा. गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रिय रहे टैन ने इन तीनों विराट व्यक्तियों के साथ कई तरह से काम भी किया था. न सिर्फ बापू के साथ बल्कि उनके आदर्शों और विचारों के साथ टैन की करीबी इतनी रही कि उन्हें ‘चीनी महात्मा’ तक कहा गया. टैन के जीवन के कुछ अनसुने और ऐसे किस्से जानिए, जो इस वक्त प्रासंगिक लगते हैं.

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गांधी से मुलाकात की कहानीसाल 1928 में जब कलकत्ते में महात्मा गांधी की आम सभा होने वाली थी, तो करीब एक लाख लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए जुट गए थे. इनमें से एक टैन भी थे, जो गांधी की एक झलक के लिए सबकी तरह बेकरार थे. वास्तव में, उस वक्त टैन कलकत्ते में टैगोर के शांति निकेतन में काम कर रहे थे इसलिए गांधी की सभा में शामिल हुए. तब किसे पता था कि जिस अहिंसा को गांधी ‘नॉन वायलेंस’ (Non-Violence) कहते थे, दार्शनिक व्याख्या करते हुए बाद में टैन उसे ‘नॉन हर्टिंग’ (Non-Hurting) कहेंगे.

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नेहरू और टैगोर के साथ टैन की यह तस्वीर टेलिग्राफ ने 2016 में प्रकाशित की थी. साभार.

तीन साल बाद, जब बारडोली सत्याग्रह की खबरें पूरी दुनिया में फैल चुकी थीं, तब चीन से कई स्कॉलर भी गांधी से मिलने और उन्हें देखने सुनने आते थे. 1931 में टैन ने बारडोली जाकर पहली बार गांधी से एक लंबी मुलाकात की थी. इस पहली मुलाकात में गांधी ने टैन को शाकाहारी बनाने की पूरी कोशिश की और दलाई लामा की चिट्ठी लेकर बापू से मिलने पहुंचे टैन को गांधी के करीबी बनने का मौका हासिल हुआ. यहां तक कि गांधी ने टैन को ‘शांति’ नाम दिया और बाद में टैन को ‘चीन का महात्मा’ तक कहा गया.

टैगोर के साथ टैन की नज़दीकियां
चीनी और पश्चिमी ज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन के साथ पोस्ट ग्रैजुएशन करने के बाद 1920 के दशक में टैन बौद्ध होकर बौद्ध धर्म की शिक्षा ले और दे रहे थे. इसी दरमियान करीब 30 साल के टैन की मुलाकात 1927 में सिंगापुर में नोबेल विजेता रबींद्रनाथ टैगोर से पहली बार हुई. टैन की प्रतिभा से प्रभावित होकर टैगोर ने उन्हें शांति निकेतन में आकर पढ़ाने का प्रस्ताव दिया, जिसे टैन ने स्वीकार किया. तब खुद टैन को भी आभास नहीं था कि वो टैगोर के ‘Chindia’ विज़न के दूत बन जाएंगे.

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अगले ही साल, टैन भारत में टैगोर द्वारा स्थापित विश्व भारती में चीनी अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर बन गए. यहां टैन ने ​समय गंवाए बगैर संस्कृत और भारतीय ज्ञान सीखना शुरू किया. भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन और रीति रिवाजों पर टैन ने कई कविताएं और लेख भी उस दौरान लिखे. भारतीय विद्या (Indology) को स्वीकार करने के बाद टैन ने भारत में चीनी विद्या (Sinology) को भारत के साथ साझा करने की शुरूआत की. जल्द ही, शांति निकेतन में ‘चीना भवन’ (Cheena Bhavana) की स्थापना हुई, जहां भारत और चीन के साझा ज्ञान और संस्कृति संबंधी पढ़ाई होती रही और एक बड़ी लाइब्रेरी बनी.

भारत और चीन के बीच पुल
न केवल शिक्षा और संस्कृति के माध्यम से, बल्कि राजनीतिक तौर पर भी टैन ने दोनों देशों के बीच पुल बनने की कोशिश की. पत्रकार इप्सिता चक्रवर्ती के लेख की मानें तो वो टैन ही थे, जिन्होंने 1938 में नेहरू की चीन यात्रा और फिर 1957 में चीनी प्रधानमंत्री झाउ एनलाई की भारत यात्रा में अहम भूमिका अदा की थी. चीन के प्रमुख माओ के निमंत्रण पर खुद टैन भी 1954 और 1959 में चीन गए थे.

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शांति निकेतन की विश्व भारती में चीना भवन की यह तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

एक तरह से भारत में बस चुके टैन भारत और चीन के बीच दूत बन गए थे, लेकिन 1959 की उनकी चीन यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच संबंध खराब होने की स्थितियां बनीं क्योंकि बॉर्डर पर संघर्ष हुए और भारत ने कहा कि चीन उसकी ज़मीन हथियाने की कोशिश कर रहा था.

चीन युद्ध और भारत में टैन
आज़ादी से पहले के समय में ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा विचार बन चुका था, जिसके चलते करीब 3000 चीनी आज़ाद भारत में अपना घर बना चुके थे. लेकिन, भारत चीन के बाद 1959 से 1962 के युद्ध के दौरान रिश्ते खराब हुए और फिर खराब ही होते चले गए. इस समय राजस्थान के देवली में एक डिटेंशन कैंप बनाया गया, जहां भारत में बसे कई चीनियों को बंद किया गया. कुछ तो चार से साढ़े चार तक कैंप में रखा गया.

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ये ऐसे ज़ख़्म थे, जो भर नहीं सके. दोनों देशों को करीब लाने की सालों तक कोशिश करने वाले टैन को भी शक के दायरे में लिया गया था, लेकिन टैन के बेटे टैन चुंग ने लिखा कि ‘नेहरू के कारण ही उनके परिवार को देवली में भेजना संभव नहीं हुआ था.’

जब नेहरू ने भाषण का सुर बदला
भारत चीन युद्ध के एक महीने बाद ही नेहरू शांतिनिकेतन में दीक्षांत समारोह में पहुंचे. वहां भाषण देते हुए उन्होंने ‘चीनी हमलावर रवैये’ पर बोलना शुरू किया था. ​इप्सिता ने लिखा है कि श्रोताओं में बैठे टैन पर नज़र पड़ते ही नेहरू ने चीन के खिलाफ अपने सुर को बहुत हल्का कर दिया था क्योंकि दोनों व्यक्तित्वों के बीच अब भी आपसी सम्मान बाकी था. नेहरू ने साफ कहा था ‘झगड़ा चीनी लोगों से नहीं, बल्कि सरकारों के बीच है.’

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गांधी और टैगोर का साथ ही नहीं, बल्कि टैन को उनकी विचारधारा भी मिली.

कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम से टैन के मन को बड़ा आघात लगा था. ‘भारत चीन साझा संस्कृति’ जैसे शब्द ईजाद करने वाले टैन ने इन घटनाक्रमों के बाद अपना पूरा जीवन बोधगया में बिताया. वहां उन्होंने बौद्ध धर्म की शिक्षा और अध्यात्म से जुड़े काम किए. साथ ही विश्व बौद्ध अकादमी की स्थापना की. जहां सालों पहले टैन ने चीनी मंदिर बनवाया था, उसके पास ही अकादमी के लिए उन्हें काफी ज़मीन भी मिली थी.

भारत में ही 1983 में आखिरी सांस लेने वाले टैन के बारे में यह भी याद रखना चाहिए कि 1933 में उन्होंने चीन के नांजिंग में चीन-भारत फ्रेंडशिप सोसायटी की स्थापना करवाई थी और उसके बाद भारत आकर टैगोर की मदद से कलकत्ता में भारत-चीन फ्रेंडशिप एसोसिएशन की नींव डाली थी. भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा पर पिछले कुछ समय से बनी हुई तनाव की स्थिति के दौरान याद करना चाहिए कि कितने लोगों ने कितना वक्त और कितनी रूह लगाकर दोनों देशों के बीच दोस्ताना और मानवीय रिश्ते बनाने के जतन किए थे.

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