Friday, February 26, 2021
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Home / Delhi NCR दिल्ली / Treatment Of Tb Patients At Dot Centers Under Municipal Corporation Difficult Due To Strikes In Delhi – नगर निगम के अधीन डॉट्स केंद्रों पर टीबी मरीजों का उपचार हुआ मुश्किल, पांच महीने में तीन बार हड़ताल, हर बार इलाज के लिए मरीज परेशान – GoIndiaNews

Treatment Of Tb Patients At Dot Centers Under Municipal Corporation Difficult Due To Strikes In Delhi – नगर निगम के अधीन डॉट्स केंद्रों पर टीबी मरीजों का उपचार हुआ मुश्किल, पांच महीने में तीन बार हड़ताल, हर बार इलाज के लिए मरीज परेशान – GoIndiaNews

नई दिल्ली स्थित डॉट्स सेंटर पर इलाज करवाता टीबी का मरीज
– फोटो : amar ujala

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नई दिल्ली स्थित किंग्सवे कैंप निवासी मीनाली आहुजा आठ माह से टीबी ग्रस्त हैं। राजन बाबू टीबी अस्पताल में इनका उपचार चल रहा है लेकिन पिछले पांच माह में तीन बार यहां हड़ताल और चार से अधिक बार विरोध प्रदर्शन के चलते उन्हें उपचार नहीं मिल पा रहा है। नगर निगम के कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह से दिल्ली के सबसे बड़े टीबी केंद्र पर इलाज मुश्किल भरा हो चुका है। 22 वर्षीय मीनाली का कहना है कि उन्हें दूसरे टीबी केंद्र पर रैफर कर दिया गया लेकिन वहां भी उन्हें काफी दिक्कतों से उपचार मिल पा रहा है। लॉकडाउन के दौरान मीनाली ने भी उपचार के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

दिल्ली के ही नेहरु नगर निवासी विवेक यादव बताते हैं कि उनका उपचार दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले चेस्ट क्लीनिक व टीबी अस्पताल में चल रहा है। लॉकडाउन के दौरान यहां पूरी तरह से सेवाएं बंद रहीं लेकिन इसके बाद भी उनके लिए उपचार आसान नहीं रहा। इतना ही नहीं तीन माह से उनके खाते में पोषण आहार की राशि तक नहीं मिली है। दिल्ली नगर निगम के अधीन टीबी केंद्रों के अलावा राज्य स्तरीय केंद्रों पर भी उपचार मुश्किलों से मिल पा रहा है। लोकनायक और जीटीबी को सरकार ने कोविड विशेष घोषित कर दिया लेकिन यहां रोजाना आने वाले सैंकड़ों टीबी मरीजों को उपचार का विकल्प नहीं दिया गया। विरोध, हड़ताल और कोरोना महामारी इस समय दिल्ली में टीबी मुक्त राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना है। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के वरिष्ठ डॉ. करन मदान का कहना है कि टीबी उपचार को लेकर अभी भी सरकारी सेवाओं को लचीला होना आवश्यक है। पहले की तुलना में काफी हद तक स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन लॉकडाउन के बाद अभी भी स्थिति वापस पटरी पर नहीं लौटी है।

वहीं द्वारका स्थित आकाश अस्पताल के वरिष्ठ डॉ. अक्षय बुद्घिराजा ने बताया कि हाल ही में 20 वर्षीय एक मरीज उनके यहां खांसी, सांस फूलना, भूख और वजन कम होने और पिछले 4 महीनों से बुखार की शिकायत लेकर आए थे। वह लॉकडाउन के दौरान घर पर था और बुखार और सांस लेने के लिए काउंटर दवाओं पर काम कर रहा था।

जांच में पता चला कि उन्हें फेफड़े में गंभीर निमोनिया था और उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम था। उनके एक्स-रे में फेफड़ों की गुहा में भी हवा दिखाई दी और दोनों फेफड़ों में छाती की नली डाली गई। फेफड़े के तरल पदार्थ से तपेदिक (टीबी) संक्रमण दिखा और उ़से दवाओं के साथ एनटीटी शुरू किया गया। अभी मरीज टीबी विरोधी दवाओं पर है लेकिन ऐसे कई मामले वह खुद अब तक देख चुके हैं। 

आंकड़ें भी दिल्ली में टीबी की हालत को कुछ ठीक नहीं बता रहे हैं। निक्षय रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में 1.10 लाख टीबी रोगियों की पहचान करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन पूरे साल में 79 फीसदी यानि 86547 मरीजों की पहचान हो पाई।

दिल्ली में 26 केंद्र हैं लेकिन किसी ने भी अपना लक्ष्य पूरा नहीं किया। साल 2019 की तुलना में -20 फीसदी रैंक पर दिल्ली है। 26 में से पांच केंद्र ऐसे हैं जहां सबसे कम मरीजों को उपचार मिला है। दिल्ली में टीबी उपचार की परेशानियों को ऐसे भी समझा जा सकता है कि साल 2020 में एक से 18 जनवरी के बीच 9120 मरीजों को पंजीकृत किया गया था लेकिन इस साल 1 से 18 जनवरी के बीच केवल 2840 मरीज ही अस्पतालों तक पहुंचे हैं। 

कोरोना महामारी की वजह से काफी चुनौतियों को सामना करना पड़ा है। निगम के केंद्रों पर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन भी दिक्कतें हैं। टीबी मरीजों को लेकर कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस वर्ष दिल्ली में बेहतर कार्य किया जाएगा। -डॉ. अश्विनी खन्ना, राज्य टीबी अधिकारी
 

साल                                         लक्ष्य                                     पंजीकृत मरीज          बढ़ोत्तरी/कमी (फीसदी में)
2018                                     106758                                      80583                          75
2019                                     1,10,000                                    107880                        98
2020                                     1,10,000                                     86547                         79

दिल्ली के इन पांच केंद्रों पर सबसे बुरा असर
केंद्र                 नुकसान (फीसदी में)
झंडेवालान            -54 
लोकनायक           -47
हेडगेवार               -45
सीडी चेस्ट             -42
जीटीबी                 -41

नई दिल्ली स्थित किंग्सवे कैंप निवासी मीनाली आहुजा आठ माह से टीबी ग्रस्त हैं। राजन बाबू टीबी अस्पताल में इनका उपचार चल रहा है लेकिन पिछले पांच माह में तीन बार यहां हड़ताल और चार से अधिक बार विरोध प्रदर्शन के चलते उन्हें उपचार नहीं मिल पा रहा है। नगर निगम के कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह से दिल्ली के सबसे बड़े टीबी केंद्र पर इलाज मुश्किल भरा हो चुका है। 22 वर्षीय मीनाली का कहना है कि उन्हें दूसरे टीबी केंद्र पर रैफर कर दिया गया लेकिन वहां भी उन्हें काफी दिक्कतों से उपचार मिल पा रहा है। लॉकडाउन के दौरान मीनाली ने भी उपचार के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

दिल्ली के ही नेहरु नगर निवासी विवेक यादव बताते हैं कि उनका उपचार दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले चेस्ट क्लीनिक व टीबी अस्पताल में चल रहा है। लॉकडाउन के दौरान यहां पूरी तरह से सेवाएं बंद रहीं लेकिन इसके बाद भी उनके लिए उपचार आसान नहीं रहा। इतना ही नहीं तीन माह से उनके खाते में पोषण आहार की राशि तक नहीं मिली है। दिल्ली नगर निगम के अधीन टीबी केंद्रों के अलावा राज्य स्तरीय केंद्रों पर भी उपचार मुश्किलों से मिल पा रहा है। लोकनायक और जीटीबी को सरकार ने कोविड विशेष घोषित कर दिया लेकिन यहां रोजाना आने वाले सैंकड़ों टीबी मरीजों को उपचार का विकल्प नहीं दिया गया। विरोध, हड़ताल और कोरोना महामारी इस समय दिल्ली में टीबी मुक्त राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना है। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के वरिष्ठ डॉ. करन मदान का कहना है कि टीबी उपचार को लेकर अभी भी सरकारी सेवाओं को लचीला होना आवश्यक है। पहले की तुलना में काफी हद तक स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन लॉकडाउन के बाद अभी भी स्थिति वापस पटरी पर नहीं लौटी है।

वहीं द्वारका स्थित आकाश अस्पताल के वरिष्ठ डॉ. अक्षय बुद्घिराजा ने बताया कि हाल ही में 20 वर्षीय एक मरीज उनके यहां खांसी, सांस फूलना, भूख और वजन कम होने और पिछले 4 महीनों से बुखार की शिकायत लेकर आए थे। वह लॉकडाउन के दौरान घर पर था और बुखार और सांस लेने के लिए काउंटर दवाओं पर काम कर रहा था।

जांच में पता चला कि उन्हें फेफड़े में गंभीर निमोनिया था और उनके शरीर में ऑक्सीजन का स्तर कम था। उनके एक्स-रे में फेफड़ों की गुहा में भी हवा दिखाई दी और दोनों फेफड़ों में छाती की नली डाली गई। फेफड़े के तरल पदार्थ से तपेदिक (टीबी) संक्रमण दिखा और उ़से दवाओं के साथ एनटीटी शुरू किया गया। अभी मरीज टीबी विरोधी दवाओं पर है लेकिन ऐसे कई मामले वह खुद अब तक देख चुके हैं। 

आंकड़ें भी दिल्ली में टीबी की हालत को कुछ ठीक नहीं बता रहे हैं। निक्षय रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में 1.10 लाख टीबी रोगियों की पहचान करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन पूरे साल में 79 फीसदी यानि 86547 मरीजों की पहचान हो पाई।

दिल्ली में 26 केंद्र हैं लेकिन किसी ने भी अपना लक्ष्य पूरा नहीं किया। साल 2019 की तुलना में -20 फीसदी रैंक पर दिल्ली है। 26 में से पांच केंद्र ऐसे हैं जहां सबसे कम मरीजों को उपचार मिला है। दिल्ली में टीबी उपचार की परेशानियों को ऐसे भी समझा जा सकता है कि साल 2020 में एक से 18 जनवरी के बीच 9120 मरीजों को पंजीकृत किया गया था लेकिन इस साल 1 से 18 जनवरी के बीच केवल 2840 मरीज ही अस्पतालों तक पहुंचे हैं। 

कोरोना महामारी की वजह से काफी चुनौतियों को सामना करना पड़ा है। निगम के केंद्रों पर हड़ताल और विरोध प्रदर्शन भी दिक्कतें हैं। टीबी मरीजों को लेकर कठिनाईयों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उम्मीद है कि इस वर्ष दिल्ली में बेहतर कार्य किया जाएगा। -डॉ. अश्विनी खन्ना, राज्य टीबी अधिकारी

 


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