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DNA ANALYSIS of how PV Narasimha Rao was neglected by Congress party | DNA ANALYSIS: नरसिम्हा राव के साथ कांग्रेस की ‘बेरुखी’ का विश्लेषण – GoIndiaNews

नई दिल्ली: 28 जून वर्ष 1921 में भारत के सबसे विद्वान प्रधानमंत्री P V नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था. उनका जन्म आंध्र प्रदेश के वारंगल में हुआ था. नरसिम्हा राव 17 भाषाएं बोल सकते थे. इनमें 9 भारतीय भाषाएं थीं और 8 विदेशी भाषाएं थीं. नरसिम्हा राव को ‘Father of Indian Economic Reforms,’ यानी ‘भारत के आर्थिक सुधारों का जनक’ कहा जाता है. प्रधानमंत्री के रूप में नरसिम्हा राव के 5 साल हमेशा याद किए जाएंगे. क्योंकि इन 5 सालों में 135 साल पुरानी कांग्रेस के इतिहास में पहली बार गांधी परिवार बैकसीट पर था. पहली बार पार्टी आगे थी. और सबकी सहमति से फैसले भी लिए जा रहे थे. लेकिन ये बात उन लोगों को पसंद नहीं आई जिन्हें ना तो नेशन फर्स्ट चाहिए, और ना पार्टी फर्स्ट. इन्हें केवल फैमिली फर्स्ट चाहिए. और यही कारण था कि इतने विद्वान प्रधानमंत्री को भी जीवन के अंतिम दौर में अपनी पार्टी की बेरुखी झेलनी पड़ी. 

नरसिम्हा राव की मृत्यु 23 दिसंबर 2004 को दिल्ली में हुई थी. उस वक्त केंद्र में यूपीए की सरकार थी. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सुपर प्राइम मिनिस्टर कहा जाता था. लेकिन, दिल्ली में नरसिम्हा राव के अंतिम संस्कार के लिए दो गज जमीन भी नहीं दी गई. इतना ही नहीं नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर को कांग्रेस के मुख्यालय में प्रवेश तक नहीं दिया गया. भारत के इतने योग्य प्रधानमंत्री का इस तरह का अपमान शायद कभी नहीं हुआ होगा.

नरसिम्हा राव के बारे में कुछ अहम बातें जो आपको जरूर जान लेनी चाहिए. 
वर्ष 1947 में भारत आजाद हुआ लेकिन हैदराबाद के निजाम ने भारत में शामिल होने से इनकार कर दिया. वंदे मातरम गाने पर रोक लगा दी गई. इसके बाद नरसिम्हा राव ने निजाम के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया था. 1951 में राव कांग्रेस में शामिल हुए. वर्ष 1957 से 77 तक वो आंध्र प्रदेश विधान सभा के सदस्य रहे. इस दौरान नरसिम्हा राव ने आंध्र प्रदेश में स्वास्थ्य, कानून और सूचना जैसे अहम मंत्रालय भी संभाले. वर्ष 1971 में वो आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने. मुख्यमंत्री रहते उन्होंने ही आंध्र प्रदेश में भूमि सुधार की शुरुआत की थी. उस वक्त आंध्र प्रदेश ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य था.

कहा जाता है कि नरसिम्हा राव इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बहुत करीबी थे. इंदिरा और राजीव गांधी की सरकारों में उन्होंने विदेश मंत्री, गृहमंत्री, रक्षा मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जैसे अहम पद संभाले. राजीव गांधी की हत्या के बाद उन्हें 1991 में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी मिली. इस चुनाव में कांग्रेस को 232 सीटें मिली थीं. बहुमत के लिए 261 सीटें चाहिए थीं. इसके बावजूद नरसिम्हा राव ने वाम दलों के साथ मिलकर बहुमत जुटा लिया. अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा किया.

विपक्ष के नेताओं से भी नरसिम्हा राव के बेहतरीन रिश्ते थे. दलगत राजनीति से ऊपर उठकर नरसिम्हा राव ने अटल बिहारी वाजपेयी को संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार आयोग जाने वाले प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व सौंपा था. 

नरसिम्हा राव, दक्षिण भारत में जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री थे. लेकिन उन्होंने ना तो कभी इस बात का जिक्र किया और ना ही उनके फैसलों में कभी क्षेत्रवाद या जातिवाद की झलक मिली.

आज हम नरसिम्हा राव द्वारा किए गए वो 4 काम आपको बताएंगे, जिनके लिए ये देश हमेशा उन्हें याद रखेगा.
पहला- नरसिम्हा राव को भारत हमेशा उनके आर्थिक उदारीकरण के लिए याद करता है. नरसिम्हा राव जब प्रधानमंत्री बने तब देश आर्थिक मोर्चे पर सबसे मुश्किल हालात से गुजर रहा था. आपने देखा होगा, अक्सर हमारे देश के विद्वान आर्थिक उदारीकरण के लिए नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह को क्रेडिट देते हैं. लेकिन ये विद्वान कभी भी नरसिम्हा राव का नाम नहीं लेते हैं. जिन्होंने मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहचाना और उनको वित्त मंत्री बनाया. यही मनमोहन सिंह बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने.

नरसिम्हा राव ने सबसे पहले भारत की आर्थिक व्यवस्था के दरवाजे दुनिया के लिए खोले. सरकारी संस्थाओं को घाटे से उबारने के लिए उनके निजीकरण की शुरुआत की. नरसिम्हा राव ने लाइसेंस राज को खत्म कर दिया. इससे पहले किसी को किसी भी उद्योग की स्थापना के लिए लाइसेंस लेना पड़ता था. इसके अलावा नरसिम्हा राव ने NSE यानी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना की. ये कंप्यूटर बेस्ड ट्रेडिंग सिस्टम था.

उनका दूसरा काम था भारत की विदेश नीति का विस्तार. 1990 तक भारत की विदेश नीति सोवियत संघ की तरफ ही झुकी हुई थी. वर्ष 1992 में नरसिम्हा राव ने ही इजराइल के साथ भारत के रिश्तों को आधिकारिक रूप दिया. वर्ष 1992 हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए नरसिम्हा राव ने अमेरिका के साथ मिलकर Malabar Naval Exercise की शुरुआत की. नरसिम्हा राव ये जानते थे कि चीन के प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका को साथ लाना बहुत जरूरी है.
Look East Policy भी नरसिम्हा राव की देन है. इस नीति के तहत भारत ने दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी Look East Policy को Act East Policy के रूप में आगे बढ़ाया है. इसी नीति के माध्यम से आज भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के देश जैसे वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, थाईलैंड और म्यांमार के बीच रिश्ते मजबूत हो रहे हैं.

नरसिम्हा राव का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम था- भ्रष्टाचार पर चोट. आपको हवाला कांड याद होगा. हवाला कांड के सामने आने के बाद देश की राजनीति में भूचाल आ गया था. इसमें माधवराव सिंधिया, सीके जाफर शरीफ, बूटा सिंह, R K धवन, N D तिवारी जैसे बड़े नाम सामने आए थे. कहा जाता है ये कार्रवाई भी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के इशारे पर ही हुई थी. हालांकि बाद में सभी आरोपी इस मामले में बरी हो गए थे. बोफोर्स घोटाले में भी दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ नरसिम्हा राव सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस घोटाले में राजीव गांधी समेत गांधी परिवार के बेहद करीबी लोग फंसे थे. नरसिम्हा राव की ये सख्ती सोनिया गांधी को बर्दाश्त नहीं हुई. और इसी के बाद से दोनों के रिश्तों में खटास आती चली गई.

और चौथा काम- नरसिम्हा राव के समय पहली बार कांग्रेस गांधी-नेहरू परिवार की छत्रछाया से बाहर निकली. नरसिम्हा राव ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने गांधी-नेहरू परिवार से ना होकर भी अपना कार्यकाल पूरा किया. नटवर सिंह ने एक बार इंटरव्यू में कहा था कि नरसिम्हा राव को लगा कि बतौर प्रधानमंत्री उन्हें सोनिया गांधी को रिपोर्ट करने की जरूरत नहीं है और उन्होंने ऐसा ही किया. यह बात सोनिया गांधी को पसंद नहीं आई. 

नाराजगी इतनी बढ़ी कि एक बार नरसिम्हा राव ने पार्टी के मंच से ही कह दिया- जैसे इंजन ट्रेन की बोगियों को खींचता है वैसे ही कांग्रेस के लिए यह जरूरी क्यों है कि वह गांधी-नेहरू परिवार के पीछे-पीछे ही चले.

बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहने के लिए अधिकतर कांग्रेसी नरसिम्हा राव को ही असली जिम्मेदार मानते थे. कांग्रेस को अपना वोट बैंक खोने का डर था. वर्ष 1996 के चुनाव में पार्टी हारी तो इसका जिम्मेदार नरसिम्हा राव को ठहरा दिया गया. लेकिन नरसिम्हा राव की प्रतिष्ठा को असली धक्का 1998 में लगा. इस बार चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से ही मना कर दिया. जब सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं तो कांग्रेस ने नरसिम्हा राव को पूरी तरह भुला दिया. पूर्व प्रधानमंत्री होने के नाते राव का समाधि स्थल दिल्ली में होना चाहिए था. लेकिन यूपीए सरकार ने फैसला किया कि राजधानी में जगह की कमी है और अब यहां समाधिस्थल नहीं बनाए जा सकते.

कांग्रेस के बड़े नेताओं के दबाव के बाद परिवारवालों ने हैदराबाद जाना स्वीकार कर लिया. 24 दिसंबर 2004 को यानी उनकी मृत्यु के अगले दिन नरसिम्हा राव के अंतिम दर्शन के लिए सभी राजनीतिक दलों के नेता आए. इसके बाद सुबह 10 बजे राव के पार्थिव शरीर को गाड़ी में रखा गया. एयरपोर्ट जाते हुए उनके पार्थिव शरीर को 24 अकबर रोड यानी कांग्रेस दफ्तर में ले जाने की योजना थी.

लेकिन जब उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस दफ्तर के सामने ले जाया गया तो वहां गेट बंद था. उनके पार्थिव शरीर को अंदर नहीं ले जाया गया. इसके बाद कांग्रेस दफ्तर के सामने ही एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था. सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस के कई बड़े नेता वहां मौजूद थे. लेकिन दुख की बात है कि ये श्रद्धांजलि समारोह कांग्रेस दफ्तर के बाहर चल रहा था. 

लेकिन कांग्रेस की संस्कृति में गांधी परिवार ही सर्वे सर्वा है. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नरसिम्हा राव के अंतिम संस्कार में मनमोहन सिंह तो गए लेकिन सोनिया गांधी नहीं गईं थीं.



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